
हरिके पत्तन नदी का बढ़ता जलस्तर: किसानों की तबाही, सरकार और समाज की पहल
तरनतारन में बाढ़ का कहर, कैबिनेट मंत्री लालजीत सिंह भुल्लर ने किया दौरा
पंजाब का तरनतारन इलाका इन दिनों प्राकृतिक आपदा का शिकार बना हुआ है। हरिके पत्तन नदी का जलस्तर लगातार बढ़ने से यहाँ के कई गाँव जलमग्न हो गए हैं। खेतों में खड़ी फसलें चौपट हो चुकी हैं और किसानों के सामने रोज़ी-रोटी का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। इस बाढ़ ने न केवल कृषि को नुकसान पहुँचाया है, बल्कि ग्रामीण जीवन को भी अस्त-व्यस्त कर दिया है
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कैबिनेट मंत्री का दौरा और किसानों से संवाद
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कैबिनेट मंत्री लालजीत सिंह भुल्लर अपने सहयोगियों के साथ हरिके नदी किनारे पहुँचे। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और किसानों से उनकी समस्याएँ सुनीं। मंत्री ने स्वीकार किया कि बाढ़ ने हज़ारों एकड़ में खड़ी फसलें पूरी तरह नष्ट कर दी हैं और इसका असर किसानों की आर्थिक स्थिति पर लंबे समय तक रहेगा।
किसानों ने उन्हें बताया कि लगातार पानी बढ़ने से धान, मक्का और सब्ज़ियों की फसल पूरी तरह खराब हो गई है। खेतों में जमा पानी निकासी के बिना अगले कई महीनों तक खेती करना मुश्किल बना देगा। मंत्री ने भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार किसानों की पीड़ा को समझती है और उनके लिए जल्द ही राहत पैकेज तथा मुआवज़े की घोषणा की जाएगी।
पुलिस और प्रशासन की सक्रियता
बाढ़ जैसी आपदा में प्रशासन की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। इसी कड़ी में अमृतसर से एएसआई सलविंदर सिंह अपनी टीम के साथ कोट बुड्ढे क्षेत्र में पहुँचे। उन्होंने नदी किनारे राहत कार्यों का जायज़ा लिया और एक दवा शिविर भी लगाया।
इस शिविर में प्रभावित ग्रामीणों और उनके मवेशियों के लिए दवाइयाँ उपलब्ध कराई गईं। सलविंदर सिंह ने कहा:
“हज़ारों एकड़ फसल पानी की चपेट में आकर बर्बाद हो चुकी है। हरिके से लेकर आसपास के गाँवों तक ज़मीन जलमग्न हो गई है। ऐसे में हमें ज़रूरी है कि हम सब मिलकर एक-दूसरे का सहारा बनें।”
पंजाब का किसान संकट में, समाज और सरकार साथ आए तो ही मिलेगी राहत
दवा शिविर से किसानों को राहत तो मिली, लेकिन असली चुनौती है लगातार बढ़ते जलस्तर से बचाव और फसलों के नुकसान की भरपाई।
सामाजिक संगठनों की भूमिका
पंजाब की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से इसकी सामाजिक और धार्मिक एकजुटता रही है। इस संकट की घड़ी में भी कई संस्थाएँ और संगठन किसानों की मदद के लिए आगे आए हैं।
बाबा बिधि चंद दल ने प्रभावित गाँवों में लंगर की व्यवस्था शुरू की है। बाढ़ में घर और रोज़गार गंवाने वाले परिवारों के लिए यह लंगर जीवनरेखा साबित हो रहा है। रोज़ाना सैकड़ों लोगों को गर्म खाना और पीने का साफ़ पानी उपलब्ध कराया जा रहा है।
इसके अलावा, स्थानीय गुरुद्वारे भी राहत केंद्रों में बदल चुके हैं, जहाँ लोगों को अस्थायी तौर पर ठहरने की सुविधा दी जा रही है। महिलाएँ और बच्चे भी इन लंगरों से भोजन पाकर राहत महसूस कर रहे हैं।
किसानों की पीड़ा
बाढ़ से सबसे ज़्यादा प्रभावित किसान ही हुए हैं। एक किसान जसविंदर सिंह ने कहा:
“हमने कर्ज लेकर बीज बोए थे, लेकिन सारा खेत पानी में डूब गया। अब न तो हमारे पास मवेशियों के लिए चारा है और न ही परिवार के लिए अन्न। सरकार अगर जल्दी मदद नहीं करती तो हालात और भी बिगड़ जाएंगे।”
दूसरे किसान गुरप्रीत सिंह ने बताया कि उनके गाँव के कई परिवारों को सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ा है क्योंकि घरों में पानी भर गया है। उन्होंने कहा कि आने वाले महीनों में गाँव के लोगों को रोज़गार और खेती दोनों के संकट का सामना करना पड़ेगा।
स्वास्थ्य और मवेशियों की समस्या
बाढ़ का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा। खेतों में जमा पानी और गंदगी के कारण बीमारियाँ फैलने का ख़तरा बढ़ गया है। कई जगह बच्चों और बुज़ुर्गों में बुखार, त्वचा रोग और संक्रमण की शिकायतें सामने आ रही हैं।
दूसरी ओर, मवेशियों के लिए चारे की कमी ने किसानों की परेशानी और बढ़ा दी है। कई परिवारों ने मवेशियों को बचाने के लिए दूर-दराज़ से चारा खरीदना शुरू किया है। जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे लंगर और दान पर निर्भर हैं।

मवेशियों के लिए चारे की कमी, किसानों की चिंताएँ और बढ़ीं
प्रशासन के सामने चुनौतियाँ
प्रशासन ने राहत शिविर और मेडिकल कैंप लगाकर कुछ राहत तो दी है, लेकिन चुनौती बड़ी है।
- बाढ़ का पानी निकालना आसान नहीं है।
- खेतों में जमा पानी से अगली फसल की बुवाई प्रभावित होगी।
- किसानों को हुए नुकसान का सही आकलन करना भी कठिन है।
सरकार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल है कि प्रभावित किसानों को किस तरह आर्थिक मदद पहुँचाई जाए ताकि वे कर्ज के बोझ और बर्बादी से उबर सकें।
सामाजिक एकजुटता और उम्मीद
इस संकट में सबसे बड़ी उम्मीद की किरण है पंजाब की सामाजिक ताकत। गाँव-गाँव से लोग चंदा जुटाकर प्रभावित किसानों की मदद कर रहे हैं। युवा राहत सामग्री और दवाइयाँ बाँट रहे हैं। महिलाओं ने खाना बनाने और वितरण की जिम्मेदारी संभाली हुई है।
एक बुज़ुर्ग किसान ने कहा:
“आज हमें फिर से वही पुराना पंजाब देखने को मिला है, जहाँ सुख-दुख में पूरा समाज एकजुट हो जाता है। अगर सरकार और समाज साथ चलें तो हम इस आपदा से भी निकल जाएंगे।”
भविष्य की ज़रूरतें
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की आपदाओं से बचाव के लिए सरकार को दीर्घकालिक योजना बनानी होगी।
- नदी किनारे मज़बूत तटबंध बनाए जाएँ।
- किसानों को बीमा और मुआवज़े की समय पर सुविधा मिले।
- राहत कार्यों के लिए स्थायी ढाँचा खड़ा किया जाए।
अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले सालों में बाढ़ का संकट और गंभीर हो सकता है।

हज़ारों एकड़ फसल जलमग्न, हरिके पत्तन नदी ने मचाई तबाही
निष्कर्ष
तरनतारन के हरिके पत्तन क्षेत्र में बाढ़ ने किसानों और ग्रामीणों की ज़िंदगी अस्त-व्यस्त कर दी है। खेत, फसलें, घर और मवेशी – सब कुछ पानी की चपेट में आ गया है। सरकार और सामाजिक संगठनों की कोशिशें जारी हैं, लेकिन नुकसान इतना बड़ा है कि इसे भरपाई करने में लंबा समय लगेगा।
फिर भी इस आपदा ने एक बात साफ़ कर दी है – पंजाब की मिट्टी के लोग मुश्किलों में एकजुट होकर खड़े होना जानते हैं। यही एकजुटता ही किसानों को इस संकट से उबरने की सबसे बड़ी ताकत बनेगी।