
तरन तारन न्यूज़: बाबा राम जोगी पीर जी मेले में दुकानें लगाने को लेकर विवाद
तरन तारन में बाबा राम जोगी पीर जी के वार्षिक जोड़ मेले में दुकानदार-ठेकेदार विवाद, बहिष्कार की चेतावनी
पंजाब की धरती पर तरन तारन मेले और मेल-जोल की परंपरा सदियों पुरानी है। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक धरोहर और लोक उत्सवों का केंद्र बने ये मेले लोगों को जोड़ने का काम करते हैं। इसी कड़ी में तरन तारन जिले के गाँव राहल चहल में हर साल बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ बाबा राम जोगी पीर जी का वार्षिक जोड़ मेला आयोजित किया जाता है।
लेकिन इस बार मेले के पहले ही दिन माहौल में तनाव देखने को मिला। दुकानदारों और ठेकेदार के बीच दुकान लगाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। दुकानदारों ने आरोप लगाया कि ठेकेदार ने ज़बरदस्ती उनकी दुकानें लगाने से रोका और टेंट तक तोड़ दिए। वहीं ठेकेदार का कहना है कि उन्हें मेले का ठेका दिया गया है और दुकानें केवल ठेके वाली ज़मीन पर ही लगाई जा सकती हैं।
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मेले का महत्व
गाँव राहल चहल का यह मेला हर साल हज़ारों श्रद्धालुओं और ग्रामीणों के आकर्षण का केंद्र बनता है।
- श्रद्धालु बाबा राम जोगी पीर जी की दरगाह पर मत्था टेकते हैं।
- धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ यहाँ लोक मनोरंजन, झूले, खिलौनों और खाने-पीने की दुकानों की रौनक रहती है।
- यह मेला स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी सहारा देता है क्योंकि ग्रामीण और छोटे व्यापारी दुकानें लगाकर अपनी रोज़ी-रोटी कमाते हैं।
लेकिन इस बार दुकानदारों और ठेकेदार के टकराव ने मेले की चमक पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
विवाद की शुरुआत
दुकानदारों का पक्ष
दुकानदारों के अनुसार—
- उन्हें गाँव के एक किसान ने मुफ़्त ज़मीन उपलब्ध कराई थी ताकि वे अपनी दुकानें सजा सकें।
- दुकानदारों का कहना है कि किसान ने साफ़ कहा था कि कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।
- लेकिन जैसे ही उन्होंने दुकानें सजानी शुरू कीं, ठेकेदार ने आकर उन्हें रोक दिया।
- दुकानदारों का आरोप है कि ठेकेदार ने धमकी दी कि यदि वे दुकानें लगाएंगे तो उनकी दुकानें जला दी जाएँगी।
- इतना ही नहीं, ठेकेदार के लोगों ने उनके टेंट की रस्सियाँ तोड़ दीं।
दुकानदारों का कहना है कि जब उन्हें मुफ़्त ज़मीन उपलब्ध कराई जा रही है, तो वे ठेके वाली ज़मीन पर एक हज़ार रुपये देकर दुकानें क्यों लगाएँगे?
दुकानदारों का बयान (बाइट)
“हमें किसान ने मुफ़्त ज़मीन दी है, लेकिन ठेकेदार हमें ज़बरदस्ती रोक रहा है। अगर हमारी दुकानें लगने नहीं दी गईं तो हम इस मेले का बहिष्कार करेंगे।”

तरन तारन मेला विवाद: दुकानदारों ने बहिष्कार की चेतावनी दी
ठेकेदार की दलील
दूसरी ओर, ठेकेदार हरदीप सिंह का कहना है कि—
- उन्हें प्रशासन और समिति की ओर से मेले का ठेका दिया गया है।
- ठेके की शर्तों के अनुसार, दुकानें केवल ठेके वाली ज़मीन पर ही लग सकती हैं।
- उन्होंने दुकानदारों की दुकानें नहीं तोड़ीं, बल्कि केवल टेंट की रस्सियाँ खोली हैं।
- दुकानदारों को कहा गया कि वे ठेके वाली जगह पर आकर दुकानें लगाएँ और निर्धारित शुल्क जमा करें।
ठेकेदार का बयान (बाइट)
“मैंने किसी की दुकानें नहीं तोड़ीं, केवल टेंट की रस्सियाँ खोली हैं। मेले का ठेका मेरे पास है, इसलिए दुकानें ठेके वाली ज़मीन पर ही लगाई जा सकती हैं।”

राहल चहल मेला: ठेके की ज़मीन और मुफ़्त ज़मीन को लेकर दुकानदार-ठेकेदार टकराव
बढ़ता विवाद और बहिष्कार की धमकी
इस विवाद ने मेले में तनाव का माहौल बना दिया।
- दुकानदारों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि जब तक ठेकेदार से उनकी सहमति नहीं होती, वे दुकानें नहीं लगाएंगे।
- उन्होंने साफ़ कहा कि अब मेले में कोई दुकान नहीं लगेगी, जिससे मेला फीका पड़ सकता है।
ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के बीच इस विवाद ने असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। कई लोगों का कहना है कि अगर दुकानें नहीं लगेंगी तो मेले की आर्थिक और सांस्कृतिक महत्ता पर असर पड़ेगा।
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प्रशासन की भूमिका
अब सवाल यह उठ रहा है कि इस विवाद को सुलझाने में प्रशासन क्या कदम उठाएगा।
- आम तौर पर मेले का ठेका ज़मीन, दुकान और झूलों की व्यवस्था के लिए दिया जाता है।
- लेकिन अगर गाँव के किसी किसान ने अपनी निजी ज़मीन मुफ़्त दी है, तो वहाँ दुकानदारों को रोकने का अधिकार ठेकेदार के पास नहीं होना चाहिए।
- दूसरी ओर, अगर यह ज़मीन भी ठेके में शामिल है, तो दुकानदारों को तय शुल्क देकर ही दुकानें लगानी होंगी।
इस स्थिति में प्रशासन को चाहिए कि वह स्पष्ट आदेश जारी करे, ताकि मेले का आयोजन सुचारु रूप से चल सके और श्रद्धालुओं को किसी तरह की असुविधा न हो।
ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की चिंता
गाँव के लोग और श्रद्धालु इस विवाद से चिंतित हैं। उनका कहना है कि—
- मेले का मकसद भाईचारा, श्रद्धा और उत्सव मनाना है।
- लेकिन दुकानदार और ठेकेदार के बीच की खींचतान से मेले का माहौल बिगड़ रहा है।
- अगर दुकानदारों ने सच में बहिष्कार कर दिया तो मेले की रौनक पर बुरा असर पड़ेगा।
मेले की सांस्कृतिक और आर्थिक अहमियत
ऐसे मेले न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देते हैं।
- छोटे व्यापारी, खिलौना विक्रेता, खाने-पीने की दुकानें, झूले और अन्य मनोरंजन साधन—सब मिलकर गाँव और आसपास के लोगों की आय का साधन बनते हैं।
- अगर विवाद के चलते दुकानें नहीं लगेंगी, तो सबसे ज्यादा नुकसान दुकानदारों और ग्रामीणों को ही होगा।
भविष्य की संभावना
वर्तमान स्थिति को देखते हुए ज़रूरी है कि:

तरन तारन अपडेट्स: बाबा राम जोगी पीर जी मेला में दुकानदारों का बहिष्कार धमकी
प्रशासन हस्तक्षेप करे और दोनों पक्षों के बीच समझौता कराए।
अगर ठेके में कोई अस्पष्टता है, तो उसकी कानूनी समीक्षा की जाए।
दुकानदारों और ठेकेदार के बीच समन्वय बनाकर मेला सुचारु रूप से आयोजित कराया जाए।
यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो यह विवाद आगे चलकर कानूनी लड़ाई का रूप भी ले सकता है।
बाबा राम जोगी पीर जी का यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है।
दुकानदारों और ठेकेदार के बीच उत्पन्न विवाद से मेले का उद्देश्य और उसकी महत्ता प्रभावित हो रही है।
अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन और समिति समय रहते इस मामले को सुलझा पाते हैं या फिर मेले का यह उत्सव विवादों की भेंट चढ़ जाता है।