Delhi: भलस्वा झील पर छठ घाट की हकीकत — गंदगी और प्रशासनिक लापरवाही

Delhi Bhalswa Lake: छठ के अवसर पर घाट बने गंदगी का प्रतीक 🌅 छठ घाट की हकीकत: भलस्वा झील पर सफाई के नाम पर गंदगी

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Delhi Bhalswa Lake: छठ के अवसर पर घाट बने गंदगी का प्रतीक

🌅 छठ घाट की हकीकत: भलस्वा झील पर सफाई के नाम पर गंदगी का अंबार, श्रद्धालु बोले – ‘अपना पैसा लगाकर घाट सजाना पड़ रहा है’

Delhi के उत्तर-पश्चिमी इलाके में स्थित भलस्वा झील (Bhalswa Lake) इस समय छठ महापर्व की तैयारियों का केंद्र बनी हुई है। लेकिन जब हमारी टीम ने ज़मीनी हकीकत देखने के लिए भलस्वा झील छठ घाट (Zero Ground) का दौरा किया, तो तस्वीर बेहद निराशाजनक नज़र आई। सफाई और व्यवस्था के दावों के बावजूद घाट पर गंदगी, गोबर और दुर्गंध का आलम है।

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जहां एक ओर दिल्ली सरकार और नगर निगम के अधिकारी यह दावा करते हैं कि

“छठ महापर्व के अवसर पर सभी घाटों की सफाई और तैयारी पूरी कर ली गई है”,

वहीं दूसरी ओर वास्तविक स्थिति कुछ और ही कहानी कहती है। श्रद्धालु और स्थानीय निवासी खुले तौर पर कह रहे हैं कि

“सरकार और नेताओं की फोटो से ज्यादा ज़मीन पर मेहनत हमारी अपनी जेब से हो रही है।”

🙏 श्रद्धालुओं की आवाज़ — “हम खुद सफाई करा रहे हैं, कोई सरकारी मदद नहीं”

भलस्वा झील के आसपास के इलाके — सिरसपुर, भलस्वा डेयरी, संजय कॉलोनी, और मुकुंदपुर — से बड़ी संख्या में लोग हर साल छठ पूजा करने यहाँ आते हैं। श्रद्धालु परिवारों का कहना है कि इस बार भी उन्हें अपनी जेब से पैसे खर्च कर सफाई और व्यवस्था करवानी पड़ रही है।

स्थानीय महिला पूजा देवी कहती हैं:

“हम हर साल यहीं छठ करते हैं। पर इस बार तो हाल बेहाल है। कीचड़, गोबर, और प्लास्टिक हर जगह फैला हुआ है। कोई सफाई कर्मी नहीं आया। हमें खुद झाड़ू लगाकर जगह साफ करनी पड़ी।”

एक अन्य श्रद्धालु संजय साहनी ने बताया:

“सरकार के लोग सिर्फ फोटो खिंचवाने आते हैं। विधायक और नेता जी आते हैं, थोड़ी देर घूमते हैं, कैमरा के सामने फूल चढ़ाते हैं और फिर चले जाते हैं। असली तैयारी तो जनता खुद करती है।”

भलस्वा झील छठ घाट: फोटो-सेशन के लिए सजावट, हकीकत में गंदगी

श्रद्धालुओं की नाराज़गी साफ़ दिखती है। उनकी मानें तो छठ पर्व की आस्था और सरकारी व्यवस्थाओं के बीच एक बड़ा अंतर है।

📸 “फोटो से साफ-सुथरा, हकीकत में गंदा” — प्रशासन के दावे खोखले

छठ पूजा को लेकर नगर निगम, डीएम ऑफिस, और सिविल लाइन ज़ोन के अधिकारियों ने दावा किया था कि सभी घाटों पर साफ-सफाई, रोशनी, और सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किए गए हैं।
सिविल लाइन ज़ोन चेयरमैन गुलाब सिंह राठौर, मॉडल टाउन SDM, और DM उत्तर जिला ने बीते दिनों घाट का औचक निरीक्षण भी किया था।

लेकिन जब हमारी टीम ने स्थल पर जाकर देखा, तो पाया कि ज़मीनी स्तर पर किसी भी प्रकार की सफाई नहीं हुई थी।

  • झील के किनारों पर कूड़े के ढेर
  • गोबर और सड़ी हुई खाद्य सामग्री
  • प्लास्टिक की बोतलें बिखरी हुई
  • झील का पानी हरा और बदबूदार

कई जगहों पर जलभराव था, जिससे श्रद्धालुओं के लिए पूजा करना मुश्किल हो रहा था।

🌾 छठ महापर्व की आस्था और जनता की मेहनत

छठ पूजा उत्तर भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है। इसमें श्रद्धालु सूर्य देव और छठी मैया की पूजा करते हैं। वे नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के क्रम में चार दिनों तक उपवास रखते हैं।

पूजा में उपयोग होने वाली वस्तुएँ:

  • सूप और बांस की टोकरी
  • ठेकुआ, गुड़, गन्ना, नारियल, केला, ईख
  • फूल, दीपक, दूध से भरे लोटे

स्थानीय निवासी दीपक चौधरी का कहना है:

“हमने प्रशासन को कई बार कहा कि सफाई करवा दो, लेकिन कोई नहीं आया। अब हम खुद ही घाट साफ कर रहे हैं। हम वादा करते हैं कि दो दिन में अपने दम पर घाट चमका देंगे। पर ये शर्म की बात है कि दिल्ली में सरकार होते हुए भी जनता को खुद झाड़ू उठानी पड़े।”

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श्रद्धालु अपनी आस्था के बावजूद प्रशासनिक लापरवाही के कारण खुद ही घाट की सफाई में जुटे हैं।

🚨 सुरक्षा और रोशनी की भी हालत खराब

भलस्वा झील क्षेत्र में शाम के समय अंधेरा और कीचड़ श्रद्धालुओं के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

  • पर्याप्त स्ट्रीट लाइट्स नहीं
  • पुलिस या सुरक्षा कर्मी नहीं तैनात

कई महिलाओं ने शिकायत की कि रात में घाट के आसपास शराबी और असामाजिक तत्व घूमते रहते हैं, जिससे डर का माहौल बना रहता है।

स्थानीय दुकानदार अरुण पासवान कहते हैं:

“हर साल यही हाल होता है। अधिकारी सिर्फ आदेश जारी करते हैं, लेकिन कोई निगरानी नहीं करता। अगर 5 लाख लोग आते हैं और इतनी गंदगी फैली रहे, तो दुर्घटना हो सकती है।”

भलस्वा झील का मेला या गंदगी का नज़ारा? श्रद्धालु बोले — ‘अपना पैसा लगाकर घाट साफ कर रहे हैं’

🧹 सफाई के नाम पर खानापूरी

सफाई कर्मचारियों ने बताया कि सफाई का ठेका तो निकला है, लेकिन असली सफाई सिर्फ दिखावे तक सीमित है।

  • मिट्टी डालने और समतल करने का काम अधूरा
  • कई जगह कचरा सीधे झील में फेंका जा रहा है
  • छोटे बच्चे और महिलाएँ झाड़ू, बाल्टी, और रेत लेकर खुद ही घाट बना रही थीं

श्रद्धालुओं का कहना है कि अगर प्रशासन चाहे, तो भलस्वा झील को सुंदर पर्यटन स्थल और धार्मिक स्थल दोनों के रूप में विकसित किया जा सकता है।
लेकिन लापरवाही के कारण यह इलाका अब बदबू और प्रदूषण का प्रतीक बन चुका है।

📊 आंकड़ों में हकीकत

स्थानीय प्रशासनिक स्रोतों के अनुसार, भलस्वा झील और आसपास के घाटों पर लगभग 5 लाख श्रद्धालु छठ पूजा में शामिल होते हैं।

  • नगर निगम द्वारा सिर्फ 25–30 सफाई कर्मचारी लगाए गए
  • इतने बड़े जनसमूह के लिए यह संख्या बेहद कम

पिछले साल भी इसी तरह के हालात रहे थे, जब कई श्रद्धालु कीचड़ में फिसलकर घायल हुए थे।
उसके बावजूद इस बार कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ।🏛 राजनीतिक उपस्थिति — “नियमित रिवाज़ बन गई है फोटो-सेशन की”

घाट पर पहुंचे कुछ राजनीतिक प्रतिनिधियों ने दावा किया कि काम जारी है और जल्द सब कुछ साफ हो जाएगा।

  • विधायक संजीव झा ने भी इलाके का निरीक्षण किया

लेकिन स्थानीय जनता का आरोप है कि यह सब केवल “दिखावे की राजनीति” है।

एक युवा ने नाराज़गी जाहिर की:

“वोट के समय नेता हमारे घर आते हैं, लेकिन त्योहार के समय सिर्फ कैमरे के लिए आते हैं। गंदगी को देखकर कोई रुका तक नहीं।”

💬 स्थानीय संगठनों की मांग — “स्थायी छठ घाट बने”

भलस्वा झील के किनारे कई वर्षों से स्थायी छठ घाट बनाने की मांग उठ रही है।
स्थानीय समाजसेवी संगठन छठ सेवा समिति के अध्यक्ष राजेश निषाद ने कहा:

“हर साल श्रद्धालु अपनी मेहनत से घाट बनाते हैं, त्योहार खत्म होते ही सब नष्ट हो जाता है। अगर सरकार यहां स्थायी घाट बनाए, तो सफाई और व्यवस्था बनी रहेगी।”

भलस्वा झील छठ घाट: सफाई के दावे खोखले, श्रद्धालु खुद कर रहे घाट सजाना

उन्होंने यह भी कहा कि अगर प्रशासन और जनता मिलकर काम करें, तो भलस्वा झील को दिल्ली का सबसे स्वच्छ धार्मिक स्थल बनाया जा सकता है।

🔍 निष्कर्ष: आस्था और जिम्मेदारी के बीच फासला

भलस्वा झील का दृश्य यह बताता है कि दिल्ली में व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच अब भी लंबा फासला है।

  • जनता की आस्था अडिग है
  • सरकार की जिम्मेदारी लापरवाही में डूबी दिखती है
  • छठ पूजा सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि सूर्योपासना और नारी शक्ति का उत्सव है

श्रद्धालु जब खुद झील साफ करने पर मजबूर हों, तो यह सवाल उठता है:

“क्या दिल्ली जैसे महानगर में आस्था को भी खुद अपने कंधों पर ढोना पड़ेगा?”

भलस्वा झील का यह अनुभव हमें यह सिखाता है कि धार्मिक आस्था और नागरिक जिम्मेदारी का संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है।

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