
Equipment Shortage Paralyzes Surgeries at Safdarjung’s Sports Injury Centre
सफदरजंग अस्पताल के स्पोर्ट्स इंजरी सेंटर में अव्यवस्था की पोल खुली
देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में शुमार Safdarjung’ Hospital का स्पोर्ट्स इंजरी सेंटर (SIC) इन दिनों गंभीर आरोपों और अव्यवस्थाओं की वजह से सुर्खियों में है। स्वास्थ्य मंत्रालय (MoHFW) के अधीन आने वाली यह आधुनिक इमारत लगभग दो वर्ष से चालू है, लेकिन यहां की जमीनी स्थिति मरीजों और कर्मचारियों दोनों को परेशान कर रही है। अंदरूनी सूत्रों और कर्मचारियों द्वारा लगाए गए आरोप इतने चिंताजनक हैं कि अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े हो गए हैं।
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नई इमारत, लेकिन आधारभूत सुविधाएं ही ठप
सूत्रों के अनुसार, स्पोर्ट्स इंजरी सेंटर की नई इमारत दो साल पहले बड़े दावों के साथ शुरू की गई थी। इसे आधुनिक तकनीक और उपकरणों से लैस बताया गया था ताकि खेल चोटों से जूझ रहे मरीजों को विश्वस्तरीय उपचार मिल सके।
लेकिन स्थिति इसके बिल्कुल उलट दिखाई देती है।
- कई बुनियादी चिकित्सा सेवाएं अभी तक शुरू नहीं हो सकी हैं।
- मरीजों और कर्मचारियों को रोजमर्रा के कार्यों में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
- अस्पताल में तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर लापरवाही साफ देखी जा सकती है।
जहां एक तरफ मरीज बेहतर इलाज की उम्मीद से यहां आते हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हें हर कदम पर असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
मुफ़्त दवाओं की सुविधा पूरी तरह बंद – गरीब मरीजों पर भारी बोझ
अस्पताल में गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए ड्रग डिस्पेंसिंग काउंटर बनाया गया था, जिसका उद्देश्य था कि मरीजों को आवश्यक दवाएं बिल्कुल मुफ़्त में उपलब्ध कराई जाएं। लेकिन:
- यह काउंटर अभी तक शुरू नहीं किया गया है।
- मरीजों को सामान्य पेनकिलर से लेकर ऑपरेशन से संबंधित महत्वपूर्ण दवाएं तक बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं।
- कई मरीजों ने बताया कि वे पहले ही आर्थिक रूप से कमजोर हैं, ऊपर से दवाएं बाहर से खरीदने का खर्च उनकी परेशानी को और बढ़ा देता है।
सरकारी अस्पताल में दवाएं मुफ्त मिलनी चाहिए, लेकिन जब अस्पताल प्रशासन ही इस पर ध्यान न दे तो स्वाभाविक है कि मरीजों को इसका खामियाजा भुगतना पड़े।

Whistleblower Staff Transferred After Exposing OT Irregularities
‘मुफ़्त सर्जरी’ का झांसा, लेकिन मरीजों से वसूले जा रहे 5,000–7,000 रुपये
यह सबसे गंभीर आरोपों में से एक है। अस्पताल में कई तरह की सर्जरी को पूरी तरह मुफ़्त बताया जाता है, लेकिन वास्तविकता बेहद चौंकाने वाली है।
कर्मचारियों और कुछ मरीजों ने बताया—
- सर्जरी से पहले मरीजों को लंबी-चौड़ी दवाओं और उपकरणों की सूची दे दी जाती है।
- उन्हें यह सामान बाहर की दुकानों से खरीदकर लाना पड़ता है।
- प्रति मरीज लगभग ₹5,000 से ₹7,000 का खर्च आ जाता है।
इस स्थिति में सवाल उठता है — जब सर्जरी मुफ़्त है तो मरीज को इतनी महंगी खरीदारी क्यों करनी पड़ रही है?
क्या यह अस्पताल प्रशासन की लापरवाही है या फिर कोई सुनियोजित अनियमितता?
कई कर्मचारियों का कहना है कि यह पैसा अप्रत्यक्ष रूप से वसूला जा रहा है, ताकि मरीज मजबूरी में बाहर से सामान लेने पर विवश हो जाएं।
ऑपरेशन थिएटर में संसाधनों की भारी कमी — डॉक्टर भी परेशान
SIC का ऑपरेशन थिएटर अस्पताल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां हर दिन कई बड़े और छोटे ऑपरेशन होते हैं। लेकिन अंदरूनी स्थिति बेहद चिंताजनक है।
11 अक्टूबर 2025 तक की वास्तविक स्थिति:
एक सीनियर रेजिडेंट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया:
- शेवर मशीनें और कॉटर्री मशीनें पिछले छह महीनों से उपलब्ध नहीं हैं।
- मजबूरी में डॉक्टरों ने कुछ शेवर निजी वेंडर से उधार लेकर उपयोग किए।
- इन उधार machines का कोई ऑफिशियल रिकॉर्ड भी नहीं बनाया गया।
- इससे संक्रमण का खतरा बढ़ता है और मरीजों की सुरक्षा पूरी तरह खतरे में पड़ जाती है।
महत्वपूर्ण उपकरण गायब
- शोल्डर सर्जरी के दौरान इस्तेमाल होने वाला एक महत्त्वपूर्ण उपकरण —
जिसे विशेष रूप से ‘बाइट्स लेने’ के लिए प्रयोग किया जाता है,
वॉरंटी में होने के बावजूद, छह महीने पहले वेंडर के पास भेजा गया था। - लेकिन यह उपकरण अब तक अस्पताल को वापस नहीं मिला।
एक सरकारी अस्पताल में जहां रोज सैकड़ों मरीज आते हैं, वहां उपकरणों की ऐसी गैरजिम्मेदाराना कमी सवालों से घिरी है।

Director Deepak Joshi Under Fire for Alleged Violation of NPA Rules
महंगे उपकरणों की खरीद में धांधली के आरोप
सूत्रों ने यह भी बताया कि शेवर मशीनों की खरीद ऐसे तकनीकी विनिर्देशों पर आधारित की गई है, जिससे केवल महंगे ब्लेड ही फिट हो सकते हैं।
- बाजार में उन्हीं मशीनों के लिए सस्ते और अनुकूल ब्लेड आसानी से उपलब्ध हैं।
- लेकिन अस्पताल में ऐसे ब्लेड का उपयोग ही नहीं किया जा सकता क्योंकि मशीन की सेटिंग को इस तरह कर दिया गया है कि केवल महंगे ब्लेड ही अनिवार्य रूप से काम करें।
यह पूरा मामला खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता और मंशा दोनों पर गंभीर सवाल उठाता है:
- क्या जानबूझकर ऐसे स्पेसिफिकेशन्स चुने गए?
- क्या इससे किसी विशेष कंपनी को फायदा पहुंचाया गया?
- क्या अस्पताल प्रशासन इस खरीद की जांच करवाने को तैयार है?
डायरेक्टर पर निजी प्रैक्टिस का गंभीर आरोप — सीधे NPA नियम का उल्लंघन
सबसे बड़ा और सबसे संवेदनशील आरोप अस्पताल के निदेशक दीपक जोशी पर लगाया जा रहा है।
केंद्र सरकार डॉक्टरों को Non-Practice Allowance (NPA) देती है, जिसके अनुसार:
- सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकते।
- बाहर सर्जरी या उपचार करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
क्या कर रहे हैं निदेशक?
सूत्रों के अनुसार:
Suspicious Unattended Bag Creates Panic at Jahangirpuri Metro Station, Delhi #breakingnews
1 अक्टूबर 2025 को दीपक जोशी ने साउथ दिल्ली स्थित MASSSH अस्पताल में डॉ. सुधीर सेठ की सर्जरी की।
बताया जा रहा है कि वे नियमित रूप से बाहरी अस्पतालों में सर्जरी करते हैं।
यहां तक कि अस्पताल की कुछ दवाइयां और उपकरण निजी उपयोग में भी ले जाए जाते हैं।
यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह सीधे सरकारी नियमों का उल्लंघन है, जिसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।
अनियमितताओं का विरोध करने वाले स्टाफ पर कार्रवाई — ‘ट्रांसफर’ का हथियार
अस्पताल में अव्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाना भी आसान नहीं है।
सूत्र बताते हैं:
- सिस्टर इंचार्ज नरिंदर कौर ने OT में हो रही अनियमितताओं का जोरदार विरोध किया।
- इसके बाद उनका ऑपरेशन थिएटर से तबादला कर दिया गया।
कर्मचारियों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन विरोध करने वालों को दंडित करता है और चुप रहने वालों को संरक्षण देता है।
ऐसे हालात में कोई भी कर्मचारी बोलने से डरता है, जिससे भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।
अस्पताल परिसर में बढ़ती नाराज़गी — मरीज भी परेशान, स्टाफ भी
स्पोर्ट्स इंजरी सेंटर में चल रही समस्याओं का असर सीधे—
- मरीजों की सर्जरी
- उनके इलाज
- उपलब्ध दवाओं
- डॉक्टर-कर्मचारियों की कार्यक्षमता
- और अस्पताल की विश्वसनीयता
पर पड़ रहा है।
कई मरीजों ने शिकायत की है कि:
- सर्जरी की तारीखें बार-बार आगे बढ़ जाती हैं।
- जरूरी उपकरण उपलब्ध नहीं होते, जिससे समय पर ऑपरेशन नहीं हो पाता।
- डॉक्टर भी संसाधनों की कमी से परेशान हैं।
कर्मचारियों का कहना है कि:
- OT की मशीनें काम नहीं करतीं।
- उपकरणों की कमी के बावजूद अधिकारियों को कोई चिंता नहीं।
- कई शिकायतें लिखित और मौखिक रूप से भेजी गईं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं।
जांच की मांग तेज — मंत्रालय में शिकायतें पहुंच चुकी हैं
फिलहाल आधिकारिक रूप से न तो सफदरजंग अस्पताल प्रशासन और न ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस मामले पर कोई बयान दिया है।
लेकिन सूत्रों का कहना है:
- कई शिकायतें मंत्रालय तक भेजी जा चुकी हैं।
- शीर्ष अधिकारी भी मामले की गंभीरता को समझ रहे हैं।
- संभावना है कि जल्द ही औपचारिक जांच शुरू की जाए।
इस मामले ने स्वास्थ्य मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं कि इतने बड़े स्तर की अनियमितताओं की समय रहते जांच क्यों नहीं की गई।

SIC Operations in Disarray: Ministry Yet to Respond to Complaints
निष्कर्ष: अस्पताल की व्यवस्था की ‘स्पोर्ट्स इंजरी’ कब भरेगी?
स्पोर्ट्स इंजरी सेंटर एक ऐसा संस्थान है जहां हर साल हजारों मरीज खेल चोटों और हड्डी संबंधी गंभीर समस्याओं से इलाज के लिए आते हैं।
लेकिन जब अस्पताल खुद ही अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, उपकरणों की कमी और निजी प्रैक्टिस के आरोपों से घिरा हो, तो मरीजों की उम्मीदें टूटना स्वाभाविक है।
आज स्थिति यह है कि:
- मुफ्त सुविधाएं बंद हैं,
- मुफ्त सर्जरी के नाम पर पैसा लिया जा रहा है,
- उपकरणों की भारी कमी है,
- स्टाफ डरा हुआ है,
- और निदेशक पर गंभीर आरोप लगे हैं।
अब प्रश्न यह है —
क्या स्वास्थ्य मंत्रालय इन आरोपों की निष्पक्ष जांच करवाएगा और मरीजों को न्याय दिलाएगा?
या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा?