
साइबर ठगी का खुलासा: DSIDC प्लॉट एलॉटमेंट फ्रॉड में न्यू अशोक नगर से आरोपी काबू
दिल्ली में साइबर ठगी का बड़ा खुलासा: DSIDC प्लॉट एलॉटमेंट के नाम पर 2.65 लाख की धोखाधड़ी, दो आरोपी गिरफ्तार
DSIDC भारत में तेजी से बढ़ते डिजिटलीकरण ने लोगों की जिंदगी को आसान जरूर बना दिया है, लेकिन इसके साथ साइबर अपराध भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। ऑनलाइन धोखाधड़ी, फर्जी कॉल, फर्जी स्कीम और निवेश योजनाओं के नाम पर लोगों को ठगने के मामले आए दिन सामने आ रहे हैं। इसी कड़ी में दिल्ली पुलिस की साइबर/उत्तर-पश्चिम टीम ने एक बड़े मामले का खुलासा किया है। इस बार अपराधियों ने DSIDC (Delhi State Industrial and Infrastructure Development Corporation) प्लॉट एलॉटमेंट का झांसा देकर लोगों से ठगी की।
दिल्ली के शालीमार बाग निवासी विजय चावला (आयु 55 वर्ष) इस ठगी के शिकार बने। उनसे 2.65 लाख रुपए हड़प लिए गए। पुलिस की सतर्कता और तकनीकी जांच से दो शातिर अपराधियों – राजू सिंह और प्रियदर्शी उर्फ कपिल – को गिरफ्तार कर लिया गया। यह मामला न केवल साइबर अपराध की गंभीरता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि अपराधी किस तरह लोगों की भरोसेमंद संस्थाओं के नाम का इस्तेमाल कर धोखा दे रहे हैं।
Delhi Cyber Police Action: ₹2.65 लाख DSIDC Plot Allotment Fraud Busted
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घटना का विवरण
यह मामला 21 दिसंबर 2024 का है, जब विजय चावला नामक व्यक्ति ने थाना साइबर/उत्तर-पश्चिम में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में कहा गया कि उन्हें फोन पर DSIDC एस्टेट में निश्चित प्लॉट एलॉटमेंट दिलाने का लालच दिया गया। अपराधियों ने उन्हें विश्वास दिलाया कि यदि वे कुछ शुल्क और अग्रिम राशि जमा कर दें तो उन्हें तुरंत प्लॉट आवंटित कर दिया जाएगा।
भरोसा दिलाने के बाद पीड़ित से 2.65 लाख रुपए ठग लिए गए। ये पैसे सीधे म्यूल अकाउंट्स (ऐसे बैंक खाते जो अपराध के लिए इस्तेमाल होते हैं) में ट्रांसफर कराए गए और बाद में उन्हें एटीएम के माध्यम से कैश निकाल लिया गया।
मामला दर्ज और एफआईआर
शिकायत के आधार पर थाना साइबर/उत्तर-पश्चिम ने FIR संख्या 89/24, दिनांक 21.12.2024 दर्ज की। इसमें भारतीय न्याय संहिता की धाराएँ –
- धारा 318(4): सार्वजनिक हित को नुकसान पहुँचाने वाले कृत्य
- धारा 319(2): धोखाधड़ी और ठगी से संबंधित अपराध
लगाई गईं। इसके बाद जांच की जिम्मेदारी एक विशेष टीम को सौंपी गई।
पुलिस टीम और जांच रणनीति
इस मामले की जांच के लिए एक समर्पित टीम गठित की गई।
टीम में शामिल थे:

DSIDC प्लॉट एलॉटमेंट स्कैम का पर्दाफाश, 2 साइबर अपराधी गिरफ्तार
SI सुनीत
HC राकेश
HC जसबीर
Ct राहुल
टीम का नेतृत्व इंस्पेक्टर दिनेश दहिया, SHO/साइबर उत्तर-पश्चिम ने किया। पूरी कार्रवाई का पर्यवेक्षण ACP/साइबर उत्तर-पश्चिम श्री राजीव कुमार कर रहे थे।
जांच की दिशा
- मनी ट्रेल विश्लेषण: पुलिस ने सबसे पहले पीड़ित से ठगे गए पैसों की ट्रांजैक्शन हिस्ट्री खंगाली।
- म्यूल अकाउंट्स की पहचान: यह पाया गया कि आरोपी पैसों को सीधे म्यूल अकाउंट्स में डलवाते थे।
- ATM निकासी का सुराग: पैसे जमा होने के तुरंत बाद एटीएम से नकद निकासी की जा रही थी।
- तकनीकी विश्लेषण: म्यूल अकाउंट से जुड़े मोबाइल नंबर की लोकेशन और कॉल डिटेल्स का गहन विश्लेषण किया गया।
- ग्राउंड वर्क: न्यू अशोक नगर और ईस्ट विनोद नगर इलाके में लगातार निगरानी की गई।
आरोपियों की गिरफ्तारी
लगातार निगरानी और तकनीकी जांच के बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों की पहचान की।
- राजू सिंह (आयु 38 वर्ष)
- पिता का नाम: बलराम सिंह
- पता: E-341, न्यू अशोक नगर, दिल्ली
- प्रियदर्शी उर्फ कपिल (आयु 40 वर्ष)
- पिता का नाम: शांति लाल
- पता: E-194, गली नं. 5, ईस्ट विनोद नगर, दिल्ली
दोनों आरोपियों को न्यू अशोक नगर इलाके से गिरफ्तार किया गया।

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पूछताछ और कार्यप्रणाली
गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में कई महत्वपूर्ण खुलासे हुए।
- राजू और प्रियदर्शी के बीच गठजोड़: राजू का संपर्क प्रियदर्शी से था।
- फर्जी खाता खोलना: प्रियदर्शी ने राजू का पता बदलवाकर उसके नाम से एक बैंक खाता खुलवाया। यह पता ऐसा था जहां राजू कभी रहता ही नहीं था।
- खाता संचालन: खाता खुलने के बाद प्रियदर्शी ने सभी क्रेडेंशियल अपने पास रख लिए।
- धनराशि का उपयोग: अपराध से प्राप्त पैसे इसी खाते में जमा कराए जाते और फिर एटीएम से निकाले जाते।
- तकनीकी सावधानी: आरोपियों ने मोबाइल सिम और इंटरनेट का इस्तेमाल सीमित तरीके से किया ताकि पुलिस तक सीधा सुराग न पहुँच पाए।
बरामदगी
गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने आरोपियों से अपराध में प्रयुक्त एक महत्वपूर्ण सबूत भी बरामद किया:
- एक मोबाइल हैंडसेट, जो म्यूल अकाउंट से जुड़ा हुआ था और जिसका उपयोग अपराध की योजना व संचालन में किया गया था।
कानूनी कार्रवाई
आरोपियों के खिलाफ दर्ज FIR संख्या 89/24 में आगे की जांच जारी है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि:
- क्या दोनों आरोपी किसी बड़े साइबर नेटवर्क का हिस्सा हैं?
- क्या इनके अन्य बैंक खातों और म्यूल अकाउंट्स का इस्तेमाल इसी तरह के अपराधों में किया गया है?
- और कितने लोग इनके जाल में फँसे हैं?
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अधिकारियों की प्रतिक्रिया
ACP/साइबर उत्तर-पश्चिम, राजीव कुमार:
“साइबर अपराधी लगातार नए तरीके निकाल रहे हैं। जनता को चाहिए कि वे किसी भी स्कीम या ऑफर में पैसा लगाने से पहले पूरी जांच करें। पुलिस ऐसे अपराधियों को पकड़ने के लिए तकनीकी और मैनुअल दोनों स्तरों पर काम कर रही है।”
इंस्पेक्टर दिनेश दहिया (SHO/साइबर उत्तर-पश्चिम):
“यह एक संगठित अपराध का हिस्सा लगता है। हम इस नेटवर्क की गहराई तक पहुँचने की कोशिश करेंगे। फिलहाल दोनों आरोपी गिरफ्तार हैं और उनसे पूछताछ जारी है।”
साइबर अपराध का बढ़ता खतरा
यह घटना इस बात का उदाहरण है कि साइबर अपराधी किस तरह सरकारी योजनाओं और संस्थाओं के नाम पर लोगों का भरोसा जीतकर उन्हें ठगते हैं।
ऐसे मामलों में आम तौर पर अपनाए जाने वाले तरीके:
- सरकारी या बड़ी कंपनी का नाम लेकर फोन कॉल करना।
- आकर्षक ऑफर, लोन, निवेश या प्लॉट एलॉटमेंट का लालच देना।
- अग्रिम शुल्क या प्रोसेसिंग फीस के नाम पर पैसा मंगाना।
- पैसे ट्रांसफर होने के बाद मोबाइल नंबर बंद करना या लोकेशन बदल लेना।
जनता के लिए सावधानियाँ
- किसी भी अज्ञात नंबर से आने वाले कॉल पर विश्वास न करें।
- सरकारी योजनाओं की पुष्टि केवल अधिकृत वेबसाइट या कार्यालय से करें।
- बैंक अकाउंट, ओटीपी या व्यक्तिगत जानकारी किसी के साथ साझा न करें।
- यदि किसी धोखाधड़ी की आशंका हो तो तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराएँ।
थाना साइबर/उत्तर-पश्चिम की पुलिस टीम ने कड़ी मेहनत और तकनीकी जांच के माध्यम से दो साइबर अपराधियों को गिरफ्तार कर एक बड़े ठगी नेटवर्क का भंडाफोड़ किया। 2.65 लाख रुपए की ठगी का यह मामला दर्शाता है कि साइबर अपराधी लगातार नए-नए तरीके अपनाकर लोगों को ठगने में लगे हैं।
यह सफलता पुलिस की सतर्कता और तकनीकी दक्षता का प्रमाण है। लेकिन असली जीत तभी होगी जब जनता भी सतर्क रहे और किसी भी तरह के लालच या झूठे आश्वासन में न फँसे।