
Arya Samaj’s 150th Anniversary Unites 40 Nations in the Spirit of Humanity
Arya Samaj’s की 150वीं वर्षगांठ पर वैश्विक सम्मेलन — मानवता और वैदिक मूल्यों का संदेश
Arya Samaj की 150वीं वर्षगांठ के वैश्विक समारोह का। इस ऐतिहासिक आयोजन में बीएपीएस के स्वामी ब्रह्मविहारिदास और योगगुरु स्वामी रामदेव जी के प्रेरणादायक और भावनात्मक उद्बोधनों ने उपस्थित जनसमूह के मन में गहरी छाप छोड़ी आस्था, संस्कृति और वैदिक विचारों की गूंज से भरा माहौल, जहाँ भारत ही नहीं, बल्कि 40 से अधिक देशों से आए प्रतिनिधि एक ही सूत्र में बंधे दिखे
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दोनों संतों ने कहा कि यह आयोजन केवल एक संस्था की उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि मानवता, धर्मनिष्ठा और वैदिक जीवन मूल्यों के पुनर्जागरण का अवसर है।
स्वामी ब्रह्मविहारिदास जी का संदेश: “वैदिक ज्ञान मानवता का अनन्त दीप है”
कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हुई, जब स्वामी ब्रह्मविहारिदास जी ने मंच पर आकर अपने गुरु स्वामी महाराज और गुरु हरि मोहन स्वामी महाराज को श्रद्धा-सुमन अर्पित किए। उन्होंने विश्वभर से आए अतिथियों का हार्दिक स्वागत करते हुए कहा —
“यह 150 वर्ष केवल बीते समय का उत्सव नहीं हैं, यह जीवन के उन अमर मूल्यों का स्मरण है जो मनुष्य को नकारात्मकता से निकालकर आत्मबोध, साहस और करुणा की दिशा में ले जाते हैं।”
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उन्होंने अबू धाबी में निर्मित भव्य मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि “जब श्रद्धा, सेवा और निरंतर प्रयास एक हो जाते हैं, तब असंभव भी संभव हो जाता है।”
उनके शब्दों में न केवल धर्म की गहराई थी, बल्कि आधुनिक युग के लिए प्रेरणा भी थी — कि कैसे वैदिक ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था।
‘ऋषि परंपरा और स्वर्णिम भारत’ — वैदिक दृष्टि से पुनर्जागरण की राह
सम्मेलन का केंद्रीय विषय था — “ऋषि परंपरा और स्वर्णिम भारत के निर्माण में उसका योगदान।”
इस सत्र में भारत सहित अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, यूके और कनाडा से आए आर्य प्रतिनिधियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने बताया कि आर्य समाज केवल एक धार्मिक संगठन नहीं, बल्कि एक वैश्विक सामाजिक सुधार आंदोलन है जो शिक्षा, समानता और सत्य के प्रसार में लगा है।
अमेरिका से आए एक वक्ता ने कहा —
“जब विश्व आज विभाजन और निराशा के द्वार पर खड़ा है, तब आर्य समाज वेदों की ज्योति से मानवता के पथ को आलोकित कर रहा है।”

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दक्षिण अफ्रीका के प्रतिनिधि ने बताया कि वहाँ आर्य संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे विद्यालयों और वेद पाठशालाओं ने हज़ारों युवाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाए हैं।
आज विश्व के 6 महाद्वीपों में आर्य समाज की 15,000 से अधिक संस्थाएं सक्रिय हैं, जो महर्षि दयानंद सरस्वती के “सत्य, शिक्षा और समानता” के संदेश को निरंतर आगे बढ़ा रही हैं।
वेद — केवल ग्रंथ नहीं, मानवता का नैतिक संविधान
सम्मेलन के दौरान यह विचार प्रमुखता से उभरा कि वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन का शाश्वत मार्गदर्शक हैं।
एक अंतरराष्ट्रीय विद्वान ने कहा —
“वेद किसी जाति, धर्म या भूगोल की सीमा में बंधे नहीं हैं; वे तो मानवता का जीवंत नैतिक संविधान हैं।”
उन्होंने कहा कि आर्य समाज का मूल उद्देश्य समाज को अंधविश्वास, अज्ञान और अन्याय से मुक्त करना है। यह आंदोलन नारी गरिमा, समानता और शिक्षा को आधार बनाकर हर वर्ग को सशक्त करता है।
स्वामी रामदेव जी का भावनात्मक उद्बोधन — “महर्षि दयानंद वह दृष्टा थे जिन्होंने भारत की आत्मा को जगाया”
स्वामी रामदेव जी जब मंच पर आए, तो पूरे सभागार में “ओम्” और “वंदेमातरम” के स्वर गूंज उठे।
उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती को स्मरण करते हुए कहा —
“महर्षि दयानंद केवल एक योगी नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को जगाने वाले युगदृष्टा थे। उन्होंने उस समय भी सत्य का उद्घोष किया जब समाज रूढ़ियों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था।”

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स्वामी जी ने भावपूर्ण काव्य पंक्तियों का उद्धरण करते हुए कहा कि दयानंद जी ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि साहस और त्याग ही सच्ची भक्ति का रूप हैं।
उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद ने गुरुकुल प्रणाली को पुनर्जीवित कर नारी सशक्तिकरण, शिक्षा सुधार और सामाजिक समानता का जो बीज बोया, वह आज वटवृक्ष बन चुका है।
स्वतंत्रता संग्राम और आर्य समाज — एक आध्यात्मिक आंदोलन
अपने संबोधन में स्वामी रामदेव जी ने स्वतंत्रता संग्राम में आर्य समाज की भूमिका को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा —
“आर्य समाज केवल धार्मिक संगठन नहीं था, यह भारत के आत्मबल का पुनर्जागरण था। महर्षि दयानंद ने जो चेतना जगाई, उसी ने आगे चलकर स्वामी श्रद्धानंद और अन्य संतों को राष्ट्र निर्माण का पथ दिखाया।”
उन्होंने बताया कि औपनिवेशिक काल में जब गुरुकुल शिक्षा प्रणाली समाप्तप्राय हो चुकी थी, तब आर्य समाज के संतों ने उसे पुनः जीवित किया।
आज उसी दृष्टिकोण की परिणति है — भारतीय शिक्षा बोर्ड जैसे उपक्रम, जिनमें वेद, दर्शन, योग और भारतीय संस्कृति को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ा जा रहा है।
“सच्ची स्वतंत्रता विचारों की स्वतंत्रता है” — स्वामी रामदेव जी
स्वामी रामदेव जी ने कहा कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक स्वतंत्रता भी उतनी ही आवश्यक है।
उन्होंने कहा —
“यदि हम केवल राजनीतिक रूप से आज़ाद हैं पर विचारों में पराधीन हैं, तो स्वतंत्रता अधूरी है। आर्य समाज का मिशन है — मनुष्य को भीतर से स्वतंत्र बनाना।”
उन्होंने आर्य समाज परिवार से आह्वान किया कि वे महर्षि दयानंद के उस स्वप्न को साकार करें जिसमें भारत ज्ञान, विवेक और आत्मनिर्भरता के शिखर पर पहुँचे।
उन्होंने कहा —
“हम ऋषियों की परंपरा के ज्ञानप्रचारक हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने हर कर्म में सत्य, साहस और देवत्व को जिएं।”
संस्कृति और समाज पर विमर्श — युवाओं को दिया जागरूकता का संदेश
कार्यक्रम के दौरान गुरुकुल की छात्राओं ने एक भावनात्मक नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने नशे की लत, अशिक्षा और नैतिक पतन जैसी सामाजिक बुराइयों पर चोट करते हुए युवाओं को सही दिशा में प्रेरित करने का संदेश दिया।
नाटक को उपस्थित जनों ने तालियों की गड़गड़ाहट से सराहा।
इस अवसर पर कई विद्वानों ने चर्चा की कि आज के डिजिटल युग में आर्य समाज किस प्रकार युवाओं के बीच वैदिक विचारों को आधुनिक भाषा में प्रस्तुत कर सकता है।
कार्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों से आए शिक्षा, समाजसेवा और सांस्कृतिक क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे।
आर्य समाज का वैश्विक प्रभाव — सत्य और समानता का मिशन
आर्य समाज की स्थापना 1875 में महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा की गई थी।
आज, डेढ़ सौ वर्षों के बाद यह आंदोलन एक वैश्विक स्वरूप ले चुका है।
दुनिया के 40 से अधिक देशों में आर्य समाज की शाखाएँ वेद, शिक्षा, योग, और सेवा के माध्यम से समाज को नई दिशा दे रही हैं।
सम्मेलन में यह भी चर्चा हुई कि भविष्य में आर्य समाज “वन अर्थ, वन फेथ, वन ह्यूमैनिटी” के भाव को लेकर संयुक्त राष्ट्र स्तर पर वैदिक संस्कृति की सार्वभौमिकता को प्रस्तुत करेगा।
इस दिशा में स्वामी ब्रह्मविहारिदास जी ने कहा —
“आर्य समाज केवल भारत की नहीं, बल्कि विश्व मानवता की चेतना का आंदोलन है। इसका उद्देश्य हर हृदय में सत्य और करुणा का संचार करना है।”

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सम्मेलन का समापन संकल्प के साथ
कार्यक्रम के तीसरे दिन के अंत में, उपस्थित श्रद्धालुओं और संतों ने एक स्वर में संकल्प लिया —
कि वे आर्य समाज के मिशन “सत्य, समानता और वेदों के शाश्वत प्रकाश” को अपने जीवन में उतारेंगे और समाज तक पहुंचाएंगे।
अब तक दो लाख से अधिक श्रद्धालु इस ऐतिहासिक आयोजन में शामिल हो चुके हैं।
सम्मेलन का भव्य समापन 2 नवंबर 2025 को होगा, जिसमें देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित संत, विद्वान और नीति-निर्माता उपस्थित रहेंगे।
निष्कर्ष — “150 वर्षों की यात्रा, 150 पीढ़ियों के लिए प्रेरणा”
आर्य समाज की यह 150वीं वर्षगांठ न केवल बीते गौरवशाली इतिहास की याद है, बल्कि आने वाले समय के लिए दिशा-सूचक दीप भी है।
महर्षि दयानंद का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है —
कि “सत्य को जानो, अंधविश्वास का त्याग करो, और अपने भीतर के देवत्व को पहचानो।”
आज जब दुनिया संघर्ष, भौतिकता और विभाजन के दौर से गुजर रही है, तब आर्य समाज की यह पुकार मानवता को पुनः आत्मज्ञान, सत्य और समरसता की ओर लौटा रही है।