

मटियाला रोड पर चौकी के साथ और हनुमान मंदिर के ठीक सामने स्थित दीदी का ढाबा आज केवल एक खाने की जगह नहीं बल्कि महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने की मिसाल बन चुका है। यह प्रोजेक्ट एकता फाउंडेशन के तहत शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर और कम साक्षर महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें सम्मानजनक रोजगार देना है।
दीदी का ढाबा की ऑपरेशन हेड स्वीटी सिन्हा के अनुसार यहां महिलाओं को खाना पकाने की ट्रेनिंग दी जाती है और बाद में उन्हें यहीं रोजगार दिया जाता है। यहां बैठकर खाने और पैकिंग दोनों की सुविधा उपलब्ध है। वर्तमान में ढाबे का पूरा संचालन महिलाएं ही कर रही हैं और अब तक सैकड़ों महिलाएं इस प्रोजेक्ट से जुड़कर लाभान्वित हो चुकी हैं।
यहां खाने की गुणवत्ता और मात्रा पर विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि कम से कम कीमत में लोगों को भरपेट और पौष्टिक भोजन मिल सके। यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग यहां नियमित रूप से खाना खाने आते हैं।
ढाबे पर मिलने वाले ग्राहकों का कहना है कि यहां के दाम, सर्विस और खाने की क्वालिटी उन्हें पूरी तरह संतुष्ट करती है। एमबीए की पढ़ाई कर रही छात्रा गोयल बताती हैं कि एक स्टूडेंट के रूप में यह जगह उनके बजट में है और खाने की मात्रा इतनी अधिक होती है कि वह अक्सर पूरा खाना अकेले खत्म नहीं कर पातीं। वहीं पुलिस में तैनात एक जवान ने बताया कि वह सप्ताह में कई बार यहां आते हैं और इस स्वादिष्ट भोजन के बड़े प्रशंसक बन चुके हैं।
पड़ोस में रहकर पढ़ाई कर रहे भाई बहन जॉकी भी यहां के नियमित ग्राहक हैं और वे अपने दोस्तों को भी यहां आने के लिए प्रेरित करते हैं।
दीदी का ढाबा की संचालिका सुनीता बताती हैं कि इस प्रोजेक्ट से जुड़ने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति पहले से काफी बेहतर हो गई है और अब वह अपने परिवार को आसानी से चला पा रही हैं। उनका मानना है कि जब महिलाएं आत्मनिर्भर बनती हैं तो उनका आत्मसम्मान और आत्मविश्वास दोनों बढ़ता है।
वहीं बुजुर्ग महिला रजनी दीदी का ढाबा का जिक्र करते हुए भावुक हो जाती हैं। नम आंखों से वह बताती हैं कि यहां उन्हें सम्मान और सहारा मिला, जिसकी वजह से वह दोबारा अपने पैरों पर खड़ी हो पाईं। उनके घर की हालत बहुत खराब थी और बेटा नशे की लत का शिकार हो गया था, ऐसे समय में दीदी का ढाबा उनके लिए जीवन का सहारा बना।
कुल मिलाकर दीदी का ढाबा सिर्फ एक ढाबा नहीं बल्कि उन महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो हालात से लड़कर आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं।